ग्राउंड रिपोर्टः मजबूर कॉलोनी का नारा है, हिंदुस्तान हमारा है

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‘मजबूर कॉलोनी का नारा है, हिंदुस्तान हमारा है’। ये बिल्कुल यूनिक सा नारा अपनी राष्ट्रीयता को क्लेम करते हुए अनशन पर बैठी मजबूर नगर, मंडावली दिल्ली की स्त्रियों ने गढ़ा है। बता दें कि देश में एनपीआर-एनआरसी-सीएए के खिलाफ़ चल रहे जबर्दस्त आंदोलनों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीए को अंसवैधानिक घोषित करने की मांग वाली याचिका पर एक महीने बाद की सुनवाई की तारीख दे दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के ढुलमुल रवैये के बाद ही मंडावली की मजबूर कॉलोनी में भी स्त्रियां अपने-अपने बच्चों को लेकर अपनी ही कॉलोनी में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गई हैं।

ये धरना देश और दिल्ली में हो रहे तमाम धरनों से एक मायने में अलग भी है। अलग इस मायने में कि इस धरने में बैठने वाली स्त्रियां रोजमर्रा की जिंदगी के लिए संघर्ष करने वाली पसमांदा समाज की स्त्रियां हैं। लोग कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ हैं। धरने में आपको एक भी स्त्री बुर्के में नहीं दिखेगी। इस धरने पर जेएनयू की छाप भी नहीं दिखती है। ये सीधे-सादे लोग अपनी राष्ट्रीयता को क्लेम करते हुए सीएए-एनआरसी-एनपीआर से आज़ादी के नारे लगा रहे हैं।

गरिमा भारद्वाज बताती हैं, “प्रोटेस्ट पूरे देश में है, क्योंकि आम आदमी अपने आप को परेशानी में पा रहा है। उन पर एनआरसी-एनपीआर-सीएए थोप दिया गया है। हमने आपको सत्ता में बिठाया है, हमने आपको बनाया है आप हमसे कागज मांगने वाले कौन होते हो? मजबूर नगर का भी नारा है कि हम कागज नहीं दिखाएंगे। आप एनपीआर क्यों करा रहे हैं। यदि आप की नीयत में खोट नहीं था तो आप सामान्य जनगणना करवाते। हम तो पहले 15 प्रश्नों के जवाब देने को तैयार हैं, बशर्ते आखिरी के छह प्रश्न आप एनपीआर से हटाएं। आप हमारे खिलाफ़ साजिश कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि ये सिर्फ़ हिंदू, मुसलमान का मसला नहीं है ये पूरी जम्हूरियत के खिसाफ़ है जिसमें दलित, आदिवासी, महिला, किन्नर और दूसरे माइनॉरिटी हैं। 70 प्रतिशत आबादी के पास कोई कागज नहीं है, क्योंकि उनके पास जमीन-जायदाद रिहाइशी प्रमाण नहीं होते। हमें समझना है एनआरसी, सीएए और एनपीआर एक दूसरे से अलग नहीं हैं। आप जीडीपी का ग्रोथ रेट नहीं बता रहे हो। नौकरियां लगातार खत्म हो रही हैं, भुखमरी, बेरोजगारी बढ़ी है। आप लगातार आर्थिक मोर्चे पर फेल हो रहे हो और अवाम के एनआरसी, एनपीआर और सीएए में फंसा कर परेशान कर रहे हो। देश में अशांति फैला रहे हो।

इकबाल मलिक कहते हैं, “हमारी बहुत मुनासिब मांग है कि सीएए, एनपीआर और एनआरसी सरकार वापिस ले ले बस। हमने भी हिंदुस्तान के बनने में बराबर का योगदान दिया है। इसमें हमारा बराबर का हक़ है। हम कोई बाहरी नहीं हैं, ये हमारा मुल्क़ है।” आस मोहम्मद कहते हैं, “दुख परेशानी यही है कि सरकार अच्छा नहीं कर रही है। सरकार हमारी एकता को तोड़ रही है। झाड़ू बंधी होती है तो काम करती है, अलग-अलग होती है तो टूट जाती है।”

एक दादी आक्रोशित होकर कहती है, “हमें हमारे मुल्क़ से निकाला जा रहा है। हम मुद्दतों से यहां रहते आए हैं। मां-बहनें आज अपने पर्दे घर में छोड़कर जाड़े में छोटे-छोटे बच्चों को लिए सड़कों पर बैठी हैं।” बच्ची सादका कहती है, “हमारे इलाके में कोई काम नहीं हुआ। इस पर ध्यान देने के बाजय सरकार ने हमें सड़कों पर बिठा दिया है।”

मोहम्मद अयाज अपनी पीड़ा सुनाते हुए कहते हैं, “मैं पूछना चाहता हूं कि मोदी-शाह कितने पढ़े-लिखे हैं, जो वकीलों और जजों को भी झुठला रहे हैं। आखिर इन्हें कब तक चुनाव और सत्ता के लिए पाकिस्तान और मुसलमान चाहिए होंगे। ये विकास की तरफ कब देखेंगे। जनता भूखी मर रही है। एनआरसी, सीएए हिटलकशाही है। हम झुग्गी-झोपड़ी वाले कागज कहां से लाएं। झुग्गियों में आग लगती है तो पूरा गांव जलकर खाक हो जाता है। कागज कहां से बचा रहेगा भाई। सरकार इस कानून को वापिस ले।”

रियाज कहते हैं, “हमें भूख, बेरोजगारी से आजादी चाहिए। मैं एक मकैनिकल इंजीनियर हूं। मेरा सेक्टर 70 कभी भी इतना डाउन नहीं रहा जितना आज है। मेरी नौकरी खतरे में है। मुझे स्पष्ट बोल दिया गया है कि मेरा इन्क्रीमेंट नहीं होगा, मेरा एप्रीजल नहीं होगा तो मैं क्यों न सड़कों पर आऊं। इन्हें हिंदू-मुस्लिम छोड़कर आर्थिक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए। हमने इन्हें हिंदू-मुस्लिम को लड़ाने के लिए नहीं वोट किया था। ये हमारी सरकार है और इन्हें हमारी बात सुननी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि हम चांद और मंगल पर पहुंचने के बजाय पीछे जा रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम ने मिलकर इस मुल्क को आजाद करवाया था। हम अपनी राष्ट्रीयता, अपनी प्रतिबद्धता अपने मुल्क के प्रति 70 साल पहले ही दिखा चुके हैं। हमने पाकिस्तान को नकार दिया है। ये इतिहास का सबसे काला कानून है। आज देश में ही नहीं यूरोप और अमेरिका के तमाम देशों में भी इस सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ प्रोटेस्ट हो रहा है।

हबीस फैजान कहते हैं, “हम एनआरसी, सीएए और एनपीआर के खिलाफ़ विरोध कर रहे हैं। मेरे वालिद के कागजातों में उनका नाम मोहम्मद अली है। जबकि मेरे कागजातों में वालिद का नाम मो. अली है। अब आप एनआरसी कराओगे तो मुझे तो डाउटफुल में डाल दोगे। फिर हम भटकते रहे हैं यहां से वहां। ये हर बात पर पाकिस्तानी, बंग्लादेशी हिंदू पीड़ित हैं, चिल्ला रहे हैं। मैं पूछता हूं कि क्या पड़ोसी मुल्क़ सिर्फ़ बंग्लादेश और पाकिस्तान और अफागानिस्तान ही हैं? म्यांमार, भूटान, बर्मा, नेपाल, श्रीलंका में हिंदू पीड़ित नहीं हैं क्या।”

उन्होंने कहा कि ये हिंदुओं की बात कर रहे हैं तो क्या तमिल हिंदू, हिंदू नहीं है, जिसे श्री लंका में प्रताड़ित किया गया। कुल मिलाकर इनका टारेगट मुस्लिम हैं। ये आरएसएस के मंसूबे को पूरा करके इस मुल्क को हिंदू मुल्क बनाना चाहते हैं। ये गांधी का मुल्क है और हम इसे गोडसे का मुल्क नहीं बनने देंगे। हम अपने मुल्क और संविधान को हर हाल में बचाएंगे।”

गली में दुकान लगाने वाले विरासत अली कहते हैं, “मोदी साहब ने बहुत गलत किया है। हमारे पास आधार कार्ड, पैन कार्ड है, वोटर कार्ड है। हम हिंदुस्तान के हैं। हम हिंदू-मुस्लिम सब भाई-भाई हैं और सदियों से एक साथ रहते आए हैं। किसी की नागरिकता नहीं छिननी चाहिए।”

(सुशील मानव पत्रकार और लेखक हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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